मोदी पर अभी भी बाजार व वित्तीय एजेंसियों का दांव

नई दिल्ली : तीन बड़े राज्यों में सत्ताधारी पार्टी भाजपा को मिली हार के बावजूद पिछले दो कारोबारी दिनों में शेयर बाजार में 820 अंकों की वृद्धि अलग कहानी कह रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की कुछ बड़ी वित्तीय सलाहकार एजेंसियों की मानें तो इस तेजी के पीछे एक वजह यह है कि निवेशक समुदाय अभी इस बात को लेकर मुतमईन है कि वर्ष 2019 में भी केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी ही दोबारा सत्ता में लौटेंगे। क्रेडिट स्विस व सीएलएसए जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और कोटक सिक्यूरिटीज जैसी घरेलू वित्त सलाहकार एजेंसी मान रही है कि इन तीन राज्यों में कांग्रेस को मिली जीत के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा अगले आम चुनाव में सत्ता से बेदखल हो सकती है। हालांकि ये एजेंसियां यह भी मानती हैं मोदी को अब ज्यादा संगठित विपक्ष का सामना करना पड़ेगा।

सीएलएसए ने बुधवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विपक्षी गठबंधन, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ सपा व बसपा का गठजोड़ चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन वर्ष 2019 चुनाव में नरेंद्र मोदी ही अभी भी ‘फेवरेट’ रहेंगे। वोट शेयरों में कुछ उलट-फेर होगा लेकिन मोदी सत्ता में बने रहेंगे। हालांकि यह एजेंसी मानती है कि वित्तीय क्षेत्र को लेकर कुछ अनिश्चितता पैदा होगी। एक दूसरी एजेंसी क्रेडिट स्विस के मुताबिक विधान सभा चुनावों के परिणामों से यह नहीं कहा जा सकता कि अगले आम चुनाव के परिणाम भी इसी तरह के रहेंगे। इन राज्यों के परिणाम में सत्ता विरोधी लहर की अहम भूमिका रही है। यह दूसरे राज्यों के चुनाव परिणामों में भी देखने को मिल सकता है लेकिन इसे भाजपा की केंद्रीय राजनीति के प्रभावित होने की बात अभी नहीं की जा सकती।

एक अन्य ब्रोकरेज एजेंसी मोतीलाल ओसवाल ने सेमीफाइनल माने जाने वाले पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के परिणाम को आम चुनाव से जोड़ कर देखने के प्रति चेताया है। इसका कहना है कि पूर्व में भी सेमीफाइनल के रिजल्ट और फाइनल (आम चुनाव) के रिजल्ट में कोई खास संपर्क नहीं रहा है। कोटक सिक्यूरिटीज ने कहा है कि राज्य और केंद्र सरकार के चुनाव में अलग अलग मुद्दों के हावी होने और मोदी के व्यक्तित्व की वजह से आगामी चुनाव में अभी भी भाजपा का पलड़ा भारी रहने के आसार है।

कई वित्तीय एजेंसियों ने विधान सभा चुनावों के बाद देश में लोकलुभावन नीतियों पर ज्यादा फोकस किये जाने की आशंका जताई है। इनका कहना है कि राजनीतिक संघर्ष बढ़ने के साथ ही वोट हासिल करने के लिए ज्यादा लोकलुभावन घोषणाएं हो सकती हैं। इससे कुछ राज्यों की राजकोषीय स्थिति पर उल्टा असर पड़ सकता है।

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