विश्व में नौवां और आध्यात्मिक आश्चर्य है भारत में होने वाला महाकुम्भ मेला : संतश्री हेम भाई


भगवान राम के गुरु वशिष्ठ के पवित्र आश्रम की गोद में स्थित है शांति वन। उस शांति वन में शांति साधना आश्रम के अधिष्ठाता हैं, विख्यात गांधीवादी आध्यात्मिक चिंतक संतश्री हेम भाई। लंदन में अंग्रेजी भाषा में उन्नत शिक्षा प्राप्त और महामानव संत बिनोबा के प्रिय शिष्यों में से एक हेम भाई असम में अध्यात्म और सामाजिक संदर्भोें के चलते-फिरते महाकोष की भांति हैं। गंभीर समाचार के प्रयागराज कुम्भ विशेषांक 2019  के लिए उनसे हुई बात के अंंश यहां उद्धृृृत हैं —



इंटरव्यू : प्रस्तुति : सत्यनारायण मिश्र 

विख्यात गांधीवादी आध्यात्मिक चिंतक संतश्री हेम भाई

 

भारत वर्ष धरती पर देवभूमि के रूप में पुरातन काल से विख्यात रहा है। इस
पवित्र धरा के कण-कण में ईश्वरत्व का वास है। किंतु हमारे ऋषि-महर्षियों
ने अपने तपोबल से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर इस पावन धरा पर
अलग-अलग तीर्थों के सृृजन किये हैं। इन तीर्थों का यद्यपि एक अंतिम
लक्ष्य सहजता से ईश मिलन पथ पर आगे बढ़ना है, मानव-महामिलन के पुण्य भाग
भी इनके दर्शन मात्र से उपलब्ध हो जाते हैं। इन समस्त तीर्थों का अधिपति
अर्थात्‌ तीर्थराज प्रयाग सदियों से वहां होते आए महाकुम्भ के लिये विश्व
भर के लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में फिर भला सभी धर्मों
और संस्कृतियों को अपने प्राणतत्व के तौर पर आत्मसात करने वाली महान असम
भूमि इससे कैसे विमुख रहती।


गंभीर समाचार : आगामी जनवरी माह में प्रयागराज में आयोजित होने जा रहा महाकुम्भ
आध्यात्मिक अधिक या अधिभौतिक ज्यादा है? इसमें उमड़ने वाली अपार भीड़ को आप
कैसे व्याख्यायित करना चाहेंगे?

हेमभाईः भारत में होने वाला कुम्भ मेला विश्व के आठ आश्चर्यों के बाद
नौवां आश्चर्य है। आठ अजूबे तो मानव निर्मित भौतिक हैं। एक दिन बदल
जाएंगे। किंतु भारत में होने वाला कुम्भ आध्यात्मिक आश्चर्य है और यह कभी
बदलेगा नहीं। दिन-ब-दिन इसकी महिमा बढ़ती ही जाएगी। इसका आध्यात्मिक पक्ष
जितना अटूट है, अधिभौतिक स्वरूप भी उतना ही महत्वपूर्ण है। न केवल हिंदू
धर्मावलंबी अपितु दुनिया भर के जिज्ञासु यहां आते हैं और अपनी-अपनी
दृष्टि के अनुकूल ज्ञानार्जन करते हैं।

गंभीर समाचार :  कैसे कह सकते हैं? वेटिकन सिटी में देखें, और पवित्र मक्का-मदीना
में भी..वहां भी तो लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं?
हेमभाईः पवित्र इस्लाम धर्म के मूल पीठ मक्का-मदीना में हज के समय 30 से
40 लाख या उससे भी कुछ अधिक लोग जुटते हैं। वेटिकन सिटी में भी क्रिसमस
के समय दुनिया भर से 40-50 लाख तक लोग पहुंचते हैं। मगर प्रयागराज की
त्रिवेणी पर जो कुम्भ मेला लगता है, वहां सात से आठ करोड़ लोग, कोई किसी
को निमंत्रण दिए या न पाते हुए भी एकत्र होते हैं। हर बार यह संख्या बढ़ती
ही जा रही है। हर कोई अत्यंत अनुशासित तरीके से अपने-अपने आध्यात्मिक
क्रिया-कांड साधना एक माह के अंदर पूरा करते हैं। न गरीब-अमीर का भेदभाव
है न छुआछूत की दुर्भावना। विराट भारत-भारती का इससे बड़ा आध्यात्मिक और
तात्विक प्रमाण और भला क्या हो सकता है।

गंभीर समाचार : मानव महामिलन के इस अवसर को आप और किस रूप में देखते हैं?
हेमभाईः मानव का मानव से प्रेम मिलन अगर कहीं देखना है तो महाकुम्भ सबसे
श्रेष्ठ अवसर है। जिसकी जितनी सामर्थ्य है, वह गरीब को देने के लिए आतुर
रहता है। पूरे एक माह तक कोई वहां भूखा नहीं रहता। जिसकी वहां दो जून की
रोटी की व्यवस्था नहीं होती, ुउसके लिए भी अन्नक्षेत्र खुले रहते हैं।
वहां कोई कपड़े के बिना ठंड से नहीं मरता। ः एक हृदय हो भारत जननीः इस
आप्तवाक्य का प्रत्यक्ष दर्शन कुम्भ मेले में मिलेगा।

गंभीर समाचार : कुम्भ मेला तो प्रयाग के अलावा अन्य तीन जगहों में भी होते हैं।
इनमें क्या कोई भेदाभेद है?
हेमभाईः इसको ऐसे समझिये- कुम्भ मेला चार जगहों में अपने-अपने हिसाब से
12-12 वर्ष के अंतराल पर होते हैं। ये चार जगहें हैं- मध्य प्रदेश का
उज्जैन, महाराष्ट्र का नासिक, उत्तराखंड का हरिद्वार और उत्तर प्रदेश का
गंगा-यमुना-सरस्वती का त्रिवेणी संगम प्रयागराज। संख्या की दृष्टि से
प्रयागराज के कुम्भ को सबसे बड़ा कुम्भ माना जाता है। बाकी तीन कुम्भों
में एक-एक नदी का किनारा होता है। जैसे उज्जैन में पवित्र नर्मदा तट,
नासिक में गोदावरी का किनारा और हरिद्वार में पवित्र गंगा मैया का तीर।
किंतु प्रयागराज में गंगा-यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी-संगम पर यह कुम्भ
आयोजित होता है। इसलिए यह भारतीय जनमानस में ज्यादा आकर्षणीय हो जाता है।

गंभीर समाचार  इतने विशाल आयोजन को ध्यान में रख सरकार से संत समाज को क्या
अपेक्षा रहती है?
हेमभाईः सरकारों की अपनी जिम्मेदारियां तो हैं ही। वे करती भी हैं। हमारा
अपना अनुभव है कि सरकारें भी इन कुम्भों के आयोजन को सफल करने के लिए
जी-तोड़ कोशिशें करती हैं। आकर्षणीय सजावट, सूक्ष्म से सूक्ष्म रीति से
सभी व्यवस्थाएं सरकारें सहृदयता पूर्वक करती हैं, जो देखते ही बनती हैं।
फिर भी कदाचित कुछ कमी रह जाती है तो वहां पूर्ण अनुशासित ढंग से पहुंचने
वाले श्रद्धालु यथासंभव व्यवस्थित कर लेते हैं।

गंभीर समाचार : आप क्या समझते हैं, क्या कुम्भ शेष विश्व के सामने भारतीयता की
विराटता के एक अनूठे महामंच के रूप में विकसित किया जा सकता है?
हेमभाईः वह तो है ही। केवल भारतीय ही क्यों, विश्व के कोने-कोने से
भक्त-जिज्ञासु, पर्यटक और शोधकर्ता कुम्भ में स्वप्रेरणा से पहुंच जाते
हैं। केवल हिंदू ही क्यों, अनेक धर्मों के लोग वहां पहुंचते हैं। किसी के
लिए कोई मनाही नहीं है। कोई दुराव नहीं है।
कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत के बारे में जो लिखा था-


पश्चिमे आज खुले आछे द्वार,सेथाहते सबे आने उपहार

दिबे आर नीबे, मिलाबे
मिलिबे, एई भारते महामानवे सागर तीरे..


सही है। भारत भूमि महामानवों का सागर है। रवींद्रनाथ की यह भावना कुम्भ
मेला में साकार होती हुई दिखायी देती है।

गंभीर समाचार : देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी डिस्कवरी
ऑफ इंडिया में भी तो कुम्भ मेले के बारे में उद्धृत किया था..
हेमभाईः पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुत सारे अमूल्य ग्रंथ लिखे हैं। भारत
एक खोज अर्थात डिस्कवरी ऑफ इंडिया उनमें से एक कालजयी महान ग्रंथ है। वे
तो विदेश में पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। साधारणतः हम लोग जिस ढंग से धर्म और
ईश्वर को मानते हैं, वैसा वे मानते नहीं थे। वे वैज्ञानिक दृष्टि रखने
वाले व्यक्ति थे। युक्ति के आधार पर ही विचार रखते थे। लेकिन एक बार
इत्तिफाक से उनका कुम्भ मेला देखना हुआ। उस समय इलाहाबाद के कुम्भ मेला
में तकरीबन डेढ़ करोड़ लोग जमा हुए थे। इतने विशाल समुदाय को देखकर उनके
मुहं से अनायास निकला कि ये सभी लोग मूर्ख तो नहीं होंगे। निश्चित ही एक
अदृश्य शक्ति ने इन लोगों को इस त्रिवेणी संगम में पहुंचाया है।
अपनी इस बात को पंडित नेहरू ने भारत एक खोज में लिखा भी है। मृत्यु के
पहलेे उन्होंने अपने इच्छा पत्र में लिखा था कि मृत्यु के बाद उनकी राख
को भारत के खेत-खलिहानों में पहुंचा दिया जाए। कुछ अंश हवाई जहाज में
लेकर हवा में बिखेर दिये जाएं। और एक अंश को त्रिवेणी संगम में विसर्जित
किया जाए। गंगा-यमुना और सरस्वती का प्रभाव तो यहां रहा ही है, लेकिन बड़ा
प्रभाव रहा है उस कुम्भ मेले का।

गंभीर समाचार : तो क्या आप यह मानते हैं कि कुम्भ में पहुंचने वालों पर उसका
आध्यात्मिक महत्व ज्यादा प्रभाव डालता है?
हेमभाईः जो भी कुम्भ मेले में जाते हैं, उनके जीवन में इस आध्यात्मिक
समावेश की अमिट छाप पड़ती ही है। यह बात सभी श्रद्धालु युगों-युगों से
अनुभव करते आए हैं। और इस अनुभव को लोगों में बांटते भी हैं। इसी कारण जो
लोग पहले कभी नहीं गए हों, उनको भी जाने की पवित्र प्रेरणा मिलती है। इसी
लिए कुम्भ मेला दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।

गंभीर समाचार : आपको क्या लगता है, इस बार प्रयाग कुम्भ में कितने श्रद्घालु जुटेंगे?
हेमभाईः लगभग 30 किमी के दायरे में बस रही कुम्भ नगरी में तकरीबन आठ से
दस करोड़ लोग इस बार पहुंच सकते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और उदार राज्य
में इतनी विशाल संख्या में श्रद्धालुओं को एक माह तक रखने और मेले को
सुचारु रूप से चलाने की शक्ति तो है ही, अनुभव भी है। उसके लिए उत्तर
प्रदेश की उदार जनता और कुशल प्रशासन के सभी श्रद्धालु आभारी रहेंगे।
प्रश्नः अन्य बातें तो बहुत हो गईं। इस कुम्भ मेले की शुरुआत को लेकर
क्या कहीं कोई पौराणिक आख्यान है?
हेमभाईः यह कुम्भ मेला किस सन्‌ और किस तारीख से शुरू हुआ था, यह निश्चित
रूप से कोई नहीं कह सकता है। देशों की सीमाएं बदली हैं। भाषाओं का भी
उतार-चढ़ाव हुआ है। किंतु कुम्भ मेला प्रागैतिहासिक काल से, यूं कहिये कि
पुराण काल से चलता आया है। पुराणों और श्रीमद्‌भागवत में भी इसका वर्णन
मिलता है। गरुड जब अमृत का कुम्भ(कलश) लेकर आए थे, उस समय उपरोक्त चारों
जगहों में कुम्भ से उछल कर अमृत की बूंदें नीचे गिर गयीं थीं।
इसे दूसरे रूप में समझें- मानव की सबसे बड़ी प्रार्थना हैः ओम असतो
मासद्गमय, तमसो माज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतंगमय। यही मूल प्रार्थना है।
इस मर्त्य लोक में सभी अमृत तत्व चाहते हैं। बार-बार जन्म लेना फिर
मृत्यु हो जाना, फिर से जन्म लेकर दुःख भोगना, यह सिलसिला यह परंपरा कोई
विवेकशील व्यक्ति नहीं चाहता। यह जो यातायात(आना-जाना) है, जन्म और
मृत्यु, जन्म से फिर मृत्यु- यही मृत्यु है। और भक्ति के द्वारा
आत्मदर्शन कर जन्म-मृत्यु की परंपरा को काट डालना यही है अमृत तत्व। इसी
अमृत तत्व को ढूढ़ते हुए लोग सदियों से कुम्भ मेलेे में जाते हैं।

गंभीर समाचार : लेकिन यह मिलन कैसे होगा? उसे ढूंढ़ने के लिए तो सम्यक्‌ दृष्टि
चाहिए। कौन देगा यह दृष्टि?
हेमभाईः संत-महंत-साधु-महापुरुष देंगे यह दृष्टि। कुम्भ मेले की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि दुनिया भर में बिखरे हुए अपने-अपने आश्रम(साधना) में
निमग्न निर्मल स्वभाव के ऋषि-मुनि-साधु-सन्त और महापुरुष गण अपने
शिष्य-प्रशिष्य, साधक मुमुक्षु गणों को लेकर कुम्भ मेले में अपने डेरे
डालते हैं। धर्म संसद जमाते हैं। अमृत उपदेशों के माध्यम से हमारे जैसे
सांसारिक लोगों को आध्यात्मिक दृष्टि देकर अमृत तत्व का संधान देते हैं।

गंभीर समाचार : कुम्भ मेले में सबसे अनोखा अनुभव क्या रहा?
हेमभाईः वातावरण में केवल ओंकार, रामकृष्ण हरि की गूंजती धुन अत्यंत
अनोखा अनुभव कराती है। इसे एक गुजराती सन्त की भाषा में कहा जाए तो यूं
कहेंगे-
चैतन्य सिन्धु घुघुबे ओम ओम। ओम निथि रश्मि झलके सूरज सोम, चैतन्य सिन्धु
घुघुबे ओम ओम।।

भारत वासियों के लिए यह एक सौभाग्य का विषय है कि ऐसा लोक कल्याणकारी,
लोक शिक्षण प्रदायक, आध्यात्मिक प्रेरणास्रोत इन चारों स्थानों पर
अपने-अपने हिसाब से 12 वर्ष के अन्तराल में आता रहता है। और मानव जाति
सीमा, भाषा, संप्रदाय, रंग, लिंग भेद भुलाकर एक मानव होने के इस मौके का
लाभ लेती रहती है। जगत में ऐसा अनोखा उदाहरण कहीं मिलना कठिन है।

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