बजट: इस रसभरी जलेबी में फंगस भी हैं / जयराम शुक्ल


सत्तापक्ष बजट की ऐतिहासिकता पर व्याख्यान दे, विपक्ष इसे अब तक की सबसे बड़ी बंड़लबाजी बताए, अर्थशास्त्री इसकी चीर फाड़कर आँतें, पलातें निकालें, इससे पहले बजट पर मोटी-मोटी दो चार बातें मेरी भी। मेरे आँकलन की औसत बुद्धि लगभग उतनी ही है जितनी कि किसी भारतीय नागरिक की। 
बताने की जरूरत नहीं कि चुनाव पूर्व के इस अंतरिम बजट में उन सभी मसलों के निदान की कोशिश दिखती है जो वोट के आड़े आ सकते हैं। पूरे बजट के मूलस्वर में किसान, मजदूर और नौकरीपेशा मध्यमवर्ग है। युवा बेरोजगार हैं पर उनके लिए सिर्फ़ शब्दों की रसभरी जलेबी भाँजी गई है।
किसान गुस्से में है। बजट में उसके लिए जो प्रावधान है वह प्रेसर कुकर के सेफ्टी वाल्व जैसे है। दो हेक्टेयर से कम के काश्तकार को सालाना 6 हजार रूपए। यह लगभग वैसे ही है जैसे कि बारात में नउआ को नेग-न्योछावर मिलता है। रोजंदारी के हिसाब से एक परिवार को लगभग साढ़े सोलह रूपये। यह घोषणा सिर्फ़ सुनने में अच्छी लगती है। खाद-बीज और पेस्टीसाइड के दाम हर साल इस 6 हजार के डेढ गुने-दूने हो जाते हैं।
पिछले चार सालों से खेती को मुनाफे का धंधा बनाने, और आमदनी दूनी करने की बात तो की जाती रही लेकिन हुआ यह कि खेती की लागत न्यूनतम समर्थन मूल्य के आगे-आगे ही भागती चल रही है। कृषिशास्त्रियों के आँकड़ों को यहां अलग रखकर मेरे साथ एक मोटा अनुमान लगाएं।
1990 में नौकरीपेशा लोगों की तनख्वाह कितनी थी? इन अट्ठाइस वर्षों में आज वह बढ़कर कहाँ पहुंच गई? इसी समयकाल में चले और पता लागाएं कि 1990 में गेंहूँ, चावल, दाल के प्रति क्विंटल की कीमत कितनी थी? मोटा-मोटी हिसाब लागाएं तो पांएगे कि इन अन्नों की कीमत अधिकतम दो से तीन या चार गुना बढ़ी है। दूसरी ओर जिस चपरासी को 1990 में पाँच हजार तनख्वाह मिलती थी आज किसी दफ्तर में बड़े बाबू की तरक्की पाते हुए साठ से पैसठ हजार की पगार, मेडिकल सुरक्षा कवच, पीएफ में अच्छा खासा बैलेंस और जिंदगी भर तनख्वाह से लगभग आधी की पेंशन। समझ में आ जाएगा कि किसान कहाँ से कहाँ पहुंचा और उसके साथ ही चलने वाले नौकरीपेशा कहाँ पहुंचे।
छह हजार सालाना का वजीफा सुनने और प्रचार करने में तो ठीक लगता है पर मूल मुद्दा जहां का तहाँ है। किसान की खुशहाली लौटाना है तो जिस हिसाब से तनख्वाह बढ़ी, बाजार का मुनाफा बढ़ा उसी हिसाब से किसानों के उपज के दाम मिलने चाहिए। इसका कोई रोडमैप नहीं बन पाया आज तक। योजनाएं छलावा निकलीं।
असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए जो भी राहत है वह 2009 के मनरेगा से निकला सबक है जिसने यूपीए को दोबारा ताजपोशी करने की मदद की। हेल्थकेयर और पेंशन की योजनाएं राहत देने वाली हैं।
मुद्दतों बाद मध्यमवर्ग की चिंता दिखी। इनकमटैक्स का स्लैब ढ़ाई से पाँच लाख पहुंच गया। इनवेस्टमेंट और हाउसिंग लोन में भी टैक्स के छूट के प्रावधान है। इसे आप चुनावी छक्का कह सकते हैं। लेकिन अभी यह बहुत साफ नहीं है कि उस क्षेत्र के टैक्सेशन का क्या रूप है जिससे इस वर्ग का रोजाना का वास्ता पड़ता है। सरकार के योजनाकार इस हाथ से देने को तो बैंडबाजे के साथ प्रचारित करते है पर उसके एवज में जेब से जिस सफाई से निकालते है उसकी मार गुप्ती की भाँति होती है।
इस चुनाव में किसानों के ही बराबर का मुद्दा युवाओं और उनकी बेरोजगारी का है। बजट के एक दिन पहले ही सांख्यिकी आयोग की लीक हुई रिपोर्ट ने पोल खोला कि बेरोजगारी पैतालीस साल के उच्चतर पर है। सरकार भले ही किंतु-परंतु करे लेकिन जाँब तो पाँच में से सिर्फ एक के पास है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले चार सालों में युवाओं को रोजगार देने की एक से एक आकर्षक योजनाएं बनी। पूरा फोकस इस बात पर रहा कि युवा नौकरी मांगने की बजाए अपने पाँव पर खड़े हों। लेकिन उसका जमीनी असर दिखा नहीं। सबसे ज्यादा जाँब असंगठित क्षेत्र में थे। सांख्यिकी कहती है कि इस क्षेत्र में जाँब तेजी से घटे हैं और अर्थशास्त्री इसका अर्थ नोटबंदी तथा जीएसटी से जोड़ रहे हैं। इस बजट में फौरीतौर युवाओं के लिए बातें तो बहुत कही गई हैं लेकिन जलेबी की तरह घुमाफिराकर, चासनी में डुबोते हुए लेकिन कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन का विकल्प तो नहीं ही बन सकता।
इस बजट से विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस के तोंते उड़े हुए हैं। हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों जहां कांग्रेस की सरकार बनी वहां किसानों की कर्जमाफी बड़ा मुद्दा रहा। लोकसभा में इसे और व्यापक बनाकर प्रचारित करने की योजना पर पलीता लग गया। कांग्रेस के नेता जब किसानों को सब्जबाग दिखाने का भाषण झाड़ रहे होंगे तब तक दो हजार रूपए किसानों के खातें में जमा हो चुके होंगे। फिलहाल फ्रस्टेशन इसी बात का है।
यह एक अच्छी बात है कि किसान राजनीतिक दलों की चिंता के केंद्रीय विषय बन चुके हैं। केंद्र के इस बजट का असर प्रदेश सरकारों के बजट में भी देखने को मिलेगा। भाजपा और कांग्रेस सरकारों के बीच किसानों को राहत लुटाने की एक होड़ सी देखने को मिल सकती है। चलिए  रूख न सही रेडरूख ही सही..कुछ तो मिलेगा।
बजट में एक चिंता अब सिरे से गायब दिखती है और वह कि अमीर और अमीर कैसे बनते जा रहे हैं। आर्थिक विषमता की खाई साल दर साल क्यों बढ़ती जा रही है। मल्टीनेशनल्स का किस तरह असर पड़ रहा है। माँल और सुपर बाजारों के आगे रेहड़ और खुदरा व्यापारियों का भविष्य क्या है..? खैर यह बड़े विमर्श का विषय है फिलहाल कल से ही सत्तापक्ष की सभाओं में बजट का बैंड,बाजा,बारात सुनने देखने के लिए तैयार हो जाएं।

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