आरक्षण का मायाजाल और नौकरियों का अकाल


-अखिलेश अखिल 
क्या आपको पता है कि प्राइवेट सेक्टर और सरकारी सेक्टर में कितनी नौकरियां हैं?इनमें से कितनी सरकारी नौकरियों पर आरक्षण मिलता है?क्या आपने सरकार की तरफ से किसी नेता, मंत्री या किसी अधिकारी को ऐसी संख्या को बताते, पढ़ा, देखा या सुना है?आपका जवाब होगा ‘नहीं।  क्योंकि मोदी सरकार 5 साल में ऐसी कोई ठीक-ठाक व्यवस्था ही नहीं बना सकी है कि सही-सही संख्या आपको पता चल सके. लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण का ‘लॉलीपॉप’ थमा दिया गया। तो चलिए जरा नौकरियों की गिनती कर ली जाए। 
     इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली  के सरकारी आंकड़ों पर बेस्ड एक रिपोर्ट बताती है देशभर में जितनी नौकरियां हैं, उनमें से सिर्फ 18 फीसदी पर ही कोटा अप्लाई होता है। मतलब करीब 1 करोड़ 54 लाख नौकरियां. इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार की हर लेवल की नौकरियां शामिल हैं। आपको ये भी पता होगा कि कुछ राज्य सरकार की नौकरियों में स्थानीय स्तर पर भी प्राथमिकता दी जाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में कुल 856 लाख सैलरी पाने वाले कर्मचारी थे। इनमें खेती-किसानी से जुड़े लोगों को शामिल नहीं किया गया था. इस 856 लाख का 70 फीसदी यानी 600 लाख प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां कर रहे हैं। मतलब सिर्फ 256 लाख लोग सरकारी सेक्टर में नौकरी कर रहे हैं। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, अब असली झटका तो ये है कि इन 256 लाख सरकारी नौकरियों में से 40 फीसदी नौकरियां कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर हैं, जिन पर रिजर्वेशन लागू नहीं होता। और करीब 60 फीसदी यानी 154 लाख सरकारी नौकरियां ही ऐसी हैं, जिन पर ये सारे आरक्षण लागू होते हैं।
    सवा सौ करोड़ देशवासी’ जो हैं, उनमें से सिर्फ 1 करोड़ 54 लाख नौकरियों पर ही आरक्षण लागू होता है। अब ये सरकारी नौकरियां कैसे मिल रही हैं ?यह किसी आग की दरिया से कम नहीं। इसका उदाहरण आप कुछ साल में हुई एसएससी परीक्षाओं, यूपी में शिक्षक भर्ती और रेलवे भर्ती की परीक्षाओं में देख सकते हैं। 
        10 फीसदी आरक्षण पर ये भी कहा जा रहा है कि सरकारी कॉलेजों में 10 लाख सीटें भी बढ़ाई जाएंगी, ऐसा ही उस वक्त हुआ था, जब साल 2007 में यूपीए सरकार ने शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी  के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। लेकिन क्या इसी तर्ज पर नौकरियों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी?आंकड़े तो कुछ और ही गवाही दे रहे हैं। नौकरियां बढ़ नहीं रहीं, घटती जा रही हैं। ईपीडब्ल्यू  की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल नौकरियों में से सरकारी नौकरियों का 23.2 फीसदी शेयर जो 2004-05 में था, वो 2011-12 में घटकर 18.5 फीसदी पर आ गया। 
अब आप बताइए कि इन चुटकीभर नौकरियों के लिए, जो लगातार घट भी रही हैं, उनके लिए आरक्षण देना ‘लॉलीपॉप’ से कम है क्या?
         अब ज़रा राजनीतिक खेलपर एक  नजर। सबसे बड़ी बात तो यह है कि चुनाव से मात्र चार महीने पहले ही इस तरह के फैसले क्यों लिए गए। विपक्ष अगर इस सवर्ण आरक्षण को लेकर सवाल उठा है तो उसमे उसकी गलत सोच क्या ? बीजेपी अगर राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के फैसले कर सकती है तो विपक्ष हमले करने से बाज क्यों आये। ये सब चलते रहेंगे। मुख्य रूपसे देखना यह है कि इस फैसले या बिल का अंतिम हश्र क्या होता है। यह बात और है संसद के दोनों सदनों से आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन बिल पास होने के बाद उस पर महामहिम  की मुहर भी लग गई है और सरकार ने अब अधिसूचना भी जारी कर दी है। लगे हाथ इस बिल के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी जा चुकी है। 
   दरअसल   पांच राज्यों में मिली हार के बाद भाजपा अब आम चुनावों में किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहती है और इसलिए हर दांव सोच-समझ कर खेल रही है।  भारत में चुनाव मुद्दों से अधिक भावनाओं के इर्द-गिर्द कैसे हो सकते हैं, इसका सफल प्रयोग भी वह अतीत में कर चुकी है। इसलिए धर्म के बाद अब वह जातिगत भावनाओं को भुनाने की तैयारी में है। सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला सरकार ने जिस हड़बड़ी में लिया, वह इसका उदाहरण है। यूं तो सवर्ण हमेशा से भाजपा के वोटबैंक माने जाते रहे हैं, लेकिन पिछले साढ़े चार सालों में भाजपा के सवर्ण समर्थक अलग-अलग कारणों से उससे नाराज हुए और बतौर मतदाता उससे दूर भी हुए।
           पद्मावत फिल्म विवाद, नोटबंदी और जीएसटी के कारण व्यापार, रोजगार को होने वाला नुकसान, बेरोजगारी की बढ़ती दर, महंगाई इन सबसे सवर्णों में नाराजगी देखी गई। फिर एससी एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भाजपा की परेशानी और बढ़ा दी। देश में दलित समुदाय की नाराजगी को रोकने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद में संविधान संशोधन पेश किया तो सवर्ण नाराज हो गए। और मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा को हराने का बाकायदा ऐलान भी किया और नतीजे उसके मुताबिक ही आए।
          विधानसभा चुनाव परिणामों की छाया आम चुनाव में न पड़े, इसलिए भाजपा में अब सवर्णों को अपने पाले में फिर लाने की बेचैनी साफ नजर आ रही है। इसलिए केंद्रीय कैबिनेट ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजार उन लोगों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का $फैसला लिया, जिनकी आमदनी आठ लाख रुपए सालाना से कम है और जिनके पास मात्र 5 एकड़ तक जमीन है। इस प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा।
          गौरतलब है कि अभी देश में कुल 49.5 प्रतिशत आरक्षण है। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों को 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। इस आरक्षण प्रस्ताव के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत होगी, जो इतना सरल काम नहीं है। लेकिन इसका राजनीतिक लाभ उठाना तो आसान है और भाजपा फिलहाल अपनी मुश्किलों को आसान करने के रास्ते ही तलाश रही है। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की व्यवस्था अभी नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में बदलाव के बाद ही यह आरक्षण लागू किया जा सकेगा। राजनैतिक दल इसे विशुद्ध चुनावी मकसद से लिया गया फैसला बता रहे हैं और इसमें कुछ गलत नहीं लगता। भाजपा यह अच्छे से जानती है कि सवर्ण आरक्षण का प्रस्ताव हकीकत में उतारना संवैधानिक रूप से आसान नहीं है। इससे पहले भी ऐसी कोशिशें हो चुकी हैं।
           पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने 25 सितम्बर 1991 को मंडल आयोग की रिपोर्ट के प्रावधानों को लागू करते हुए अगड़ी जातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी।  हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसे ख़ारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस के फैसले में इस आरक्षण को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरक्षण का आधार आय व संपत्ति को नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में आरक्षण समूह को है, व्यक्ति को नहीं। आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। इसी तरह 2017 में गुजरात सरकार के छह लाख वार्षिक आय वालों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को अदालत ने खारिज कर दिया।
             राजस्थान में भाजपा सरकार ने उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में बेहद गरीबों के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था 2015 में की थी, वह भी अदालत से खारिज हो गई थी। कहने का आशय यह कि संवैधानिक व्यवस्था से हटकर आरक्षण की ऐसी कोशिशें पहले नाकाम हो चुकी हैं, फिर भी मोदी सरकार ने आरक्षण के जिन्न को बोतल से बाहर निकाला है। लेकिन इस जिन्न को हुक्म देने से पहले उसे कई सवालों के जवाब भी देने होंगे, जैसे आर्थिक पिछड़ेपन की पहचान कैसे होगी? एक परिवार में एक सदस्य 8 लाख और दूसरा उससे कम कमाएगा, तो क्या एक को आरक्षण का पात्र और दूसरे को अपात्र समझा जाएगा? ओबीसी या एससीएसटी समुदाय के जो लोग 8 लाख सालाना कमाते हैं क्या उन्हें इतनी ही कमाई वाले सवर्ण से ऊंचा माना जाएगा या पिछड़ा माना जाएगा?
            हरियाणा में जाट, राजस्थान में गूजर और गुजरात में पाटीदार जो आरक्षण की मांग कर रहे  हैं, उन्हें अब सरकार क्या जवाब देगी? शायद मोदी सरकार जानती है कि उसे इन सवालों से दो-चार होना पड़ेगा, लेकिन किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक, युवा, बेरोजगार, व्यापारी, सैनिक ये सारे लोग जब अपने हितों से जुड़े सवाल उठाएंगे, तो उनके जवाब देना और कठिन हो जाएगा। इसलिए उसने आरक्षण का नया शिगूफा छेड़ दिया है। अब आने वाला वक्त ही बताएगा कि ये मोदीजी का मास्टर स्ट्रोक होता है या मिस्टेक स्ट्रोक। इतना जरूर है कि बीजेपी अपने इस खेल का लाभ उठाना चाहेगी और संभव है कि जो सवर्ण कलतक आरक्षण के विरोध में आवाज उठा रहे थे ,मोदी के इस खेल के समर्थन में वोट डाल सकते हैं। और ऐसा हुआ तो बीजेपी को कुछ लाभ जरूर मिलेगा। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सब्सक्राइब ' गंभीर समाचार ' न्यूज़लेटर