आंतकवाद की गर्भनाल पर प्रहार करो ज्वलंत/जयराम शुक्ल

“कल सपने में इन्दिराजी दिखी थीं। रक्षा मंत्रालय के वाँर रूम में इस्पात से दमकते चेहरे के साथ युद्ध का संचालन करते हुए।

दृश्य 1971 के युद्ध के दिख रहे थे। ढाका में पाकिस्तान का जनरल नियाजी अपने 93 हजार पाकी फौजियों के साथ ले.जनरल जेएस अरोरा के सामने घुटने टेके हुए गिड़गिड़ाता हुआ।

इधर गड़गड़ाती तोपों के साथ लाहौर और रावलपिन्डी तक धड़धड़ाकर घुसते टैंक। आसमान से बमवर्षक जेटों की चीख और धूल-गदरे-गुबार से ढंका हुआ पाकिस्तान का वजूद।

मेरे जैसे करोड़ों लोगों को आज निश्चित ही इन्दिराजी याद आती होंगी जिन्होंने देश के स्वाभिमान के साथ कभी समझौता नहीं किया।”………

-तब से अब तक की जमीनी हकीकत में यह बदलाव हुआ कि पाकिस्तान दुनिया भर के शैतानों की धुरी बन चुका है। हर कोई उसे इजराइल शैली में जवाब देने की बात करता है

-हकीकत के फलक पर खड़े होकर एक बात गौर करना होगी। इजराइल जिन मुल्कों से घिरा है उनके पास आणविक हथियार नहीं हैं तथा उसकी पीठ पर अमेरिका, इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे नाटो देशों का हाथ है।

-यहां पाकिस्तान एटम बमों से लैश है, उसकी शैतानियत की गर्भनाल इन्हीं एटमी हथियारों के नीचे गड़ी है। सही मायने में पूछा जाए तो दुनियाभर के इस्लामिक आतंकवाद को यहीं से ऊर्जा मिलती है।

-अब तक दुनिया में जहां कहीं जितनी भी बड़ी आतंकी वारदातें हुयी हैं उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर पाकिस्तान से सम्बन्ध रहा है।

– पाकिस्तान को सेवा-चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में अमेरिका जितना भी अनुदान देता है उसका हिस्सा हाफिज के जमात-उद-दावा, जैश-ए-मोहम्मद के खाते में चला जाता हैं और उसी रकम से कश्मीर में जब-तब दबिश देने वाले आतंकी तैय्यार होते हैं।

-पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की नीति अभी भी भारत के लिए एक अबूझ पहेली की भांति है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि अमेरिका सबकुछ जानते हुए भी आँखे मूदे हुए है,और उसी की खैरात में दी गई रकम से अप्रत्यक्ष रूप से आतंकी संगठन पल रहे हैं।

– जनमत के दवाबवश जब अमेरिका पाकिस्तान की मदद से थोड़ा पीछे हुआ तो चीन ने उसकी भरपाई कर दी। अजहर मसूद उसका घोषित लाड़ला बना हुआ है।

-याद करिए संयुक्तराष्ट्र संघ की सहमति से अमेरिका ने इराक पर इस संदेह के आधार पर हमला कर उसे बर्बाद किया था कि वहां उसने जैविक व रासायनिक हथियार जुटा लिए हैं।

-अमेरिका को वो नरसंहार के हथियार मिले या नहीं लेकिन इराक मिट्टी में मिल गया और सद्दाम हुसैन को चूहे की मौत
मिली।

-यह निष्कर्ष भी अमेरिकी का ही है कि पाकिस्तान की मिलिट्री और उसकी खुफिया एजेन्सी आईएसआई आतंकवादी संगठनों से मिले हुए हैं और वे इनका इस्तेमाल पड़ोसी देशों के
खिलाफ रणनीतिक तौर पर करते हैं।

– पाकिस्तान की जम्हूरियत वहां की मिलिट्री की बूटों के नीचे दबी है। लोकतंत्र महज मुखौटा हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के एटमी हथियार
सर्वदा असुरक्षित हैं और जो मिलिट्री एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को पाल सकती है वह किसी भी हद तक जा
सकती है।

-आतंकवाद का दायरा जिस तरह बढ़ता जा रहा है आज नहीं तो कल एक निर्णायक जंग छिडऩी ही है ऐसी स्थिति में यदि पाकिस्तान के एटमी हथियारों का जखीरा आतंकवादियों के हाथ लग गया तो दुनिया का क्या हश्र होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

-जेहाद के नाम पर आतंक का कारोबार करनेवाले जैश ए मोहम्मद, आईएसएस, अलकायदा और तालीबान जैसे संगठनों के शुभचिन्तक पाकिस्तान की मस्जिदों के बाहर मिलिट्री में भी हैं व वहां के राजनीतिक संगठनों में भी।

– अब वक्त की मांग यह है कि पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठान को संयुक्त राष्ट्र संघ अपने कब्जे में लेकर इस बात का परिक्षण करे कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम कितना शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और कितना उसके शैतानी मंसूबों के लिए।

– भारत की अब यही रणनीति होनी चाहिए कि वह पाकिस्तान पर कार्रवाई के लिए वैसा ही विश्वमत बनाए जैसा कि अमेरिका ने कभी ईराक के खिलाफ तैय्यार किया था। यूरोपीय देशों की हर आतंकी घटनाओं के सूत्र पाकिस्तान से संचालित होते हैं। आज पुलवामा में धमाका हुआ है तो कल ऐसे ही पेरिस परसों लंदन और नरसों वाशिंगटन में भी हो सकते हैं।

– अब जरूरी है कि पाकिस्तान के एटमी जखीरे पर संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति सेना का कब्जा हो। या विश्व जनमत भारत की ऐसी कार्रवाई का समर्थन करने आगे आए।

-परमाणु शक्तिविहीन पाकिस्तान में कोई आतंकी शिविर भी नहीं चल पाएंगे क्योंकि ऐसी स्थिति में इन शिविरों को निपटाने में भारत कोई ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

-और अंत में
सांप को वश में करना है तो उसके विषदंत को तोड़ दीजिए, इसके बाद भी फुफकारे तो कुचल दीजिए, समूचा देश यही चाहता है । आम हिन्दुस्तानी को उसके एटम बम का डर नहीं क्योंकि जब राष्ट्र रहेगा उसका स्वाभिमान बना रहेगा तभी जीने का मतलब है।

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