शास्त्रीय संगीत के बिना संगीत गायन संभव नहीं: रूहानी सिस्टर्स


संगीत वह भी सूफी गायकी। मानो आत्मा से परमात्मा का मिलन। संगीत में जब बेहतर साथ हो, आत्मीयता जब रूह के जरिए एक-दूसरे में उतरती चली जाती है, तो रूहानी सिस्टर्स बनती हैं। जागृति लूथरा प्रसन्ना और नीता पांडे नेगी यह दोनों भले ही सगी बहनें ना हो, लेकिन सूफी संगीत के लिए उनके प्यार ने उन्हें एक साथ रुह से जोड़ दिया है और एक साथ एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। रूहानी सिस्टर्स की सबसे खास बात है कि वह अपनी सूफी संगीत, बुलंद आवाज़, ताल और अपनी रुहानी आवाज़ से लोगों की रूह को छू लेती है। उनकी संगीत साधना से जुड़े मसले पर सुभाष चंद्र  ने लंबी बात की। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश: 


रूहानी सिस्टर्स को नाम से पूरी दुनिया जानती है। लेकिन बहुत कम जानते हैं कि आप दोनों सगी बहने नहीं हैं। फिर साथ में जुगलबंदी का विचार कैसे आया?

– हमारा नाम रूहानी सिस्टर्स है। जिसका मायने है कि हम रूह से जुड़े हुए हैं। सूफी संगीत को हम गाते हैं। जहां तक जुगलबंदी की बात है तो हर कोई आगे आना चाहता है। कुछ नया करना चाहते है। ऐसा हमने भी सोचा। साल 2008 की बात है जब मैं नीता एमए और दीदी जागृति एमफिल कर रही थीं। उस समय हमने सोचा कि संगीत में क्या अलग हो सकता है। गाने में सिंगल तो बहुतेरे गायक गायकी करते हैं, लेकिन तब महिलाओं में जुगलबंदी नहीं के बराबर थी। हमारी सोच बहुत मिलती थी। दोनों में मेहनत, जज्बा, जुनून था। यही चीज हम दोनों आगे लेकर गए और आप सब के बीच हैं।


आपने गायकी में सूफी गायकी ही क्यों चुनी?

– सूफी गायकी हमारा जुनून था। कुछ नया करने की चाहत थी। हम दोनों में कुछ नया करने का जज्बा व जुनून था। मेहनत से घबराते नहीं थे। एक दिन मे ंहम 16 घंटे रियाज करते थे। गायन में कोई जात-पात नहीं होती। यह गायकी मुश्किल थी। सीखने के लिहाज से इतर इस गायकी में पुरुषों का वर्चस्व है। इसमें अपना स्थापित्व जमाना कठिन था। खैर, हमने इसे चैलेंज की तरह लिया है।


कितनी कठिन रही आपकी म्यूजिक जर्नी? क्या गायकी का जुड़ाव घर से मिले संगीत संस्कार थे या आस-पास का माहौल , इस सफर में माता-पिता का योगदान रहा?

– हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं रहा। हमारे माता-पिता ने हमारा साथ दिया। हम दोनों के माता-पिता ने शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा है। उन्हें संगीत से आत्म लगाव है। संगीत तो हवा में भी है। हमारे यहां दुर्गा भजन, जागरण, चैकी चलती आ रही है। संगीत संस्कार व संगीतमय माहौल घर में शुरू से रहा है, लेकिन विधिवत शास्त्रीय संगीत की शि़क्षा नहीं ली है। मेरे पिता जी की चाहत थी कि वो शास्त्रीय संगीत की तालीम लें। वो नहीं ले पाए, तो मैंने ली। नीता में नानी जी उत्तराखंड के फोक गायक हैं। मेरे छोटे नाना जी रिटायर्ड रेडियो आर्टिस्ट थे। उनमें था शास्त्रीय संगीत को सीखना और आगे लेकर जाना, लेकिन उनके बाद वाली पीढ़ी इसे आगे नहीं ले जा सकी। मेरी मां को बहुत शौक था कि मैं संगीत सीखूं। हम दोनों की स्थितियों के साथ शौक बहुत मेल खाया। दोनों के माता-पिता चाहते थे कि हमारी बच्चियां संगीत सीखें।


गायन में करियर बनाने के लिए किसी घराने या गुरु का सान्निध्य और विधिवत शिक्षा अनिवार्य है?

– हम दोनों ने शास्त्रीय संगीत सीखा है। आज भी सीख रहे हैं। संगीत अनंत है। आज भी हम अपने गुरुओं से सीख रहे हैं और आगे भी सीखेंगे। (डाॅ नीता पांडे नेगी) मैं दिल्ली घराने से हूं।  (डाॅ जागृति लूथरा ) मैं कैराना घराने से हूं। (डाॅ जागृति लूथरा ) मैं मेरी संगीत की शुरुआत केतकी बैनर्जी से हुई। उनकी इजाजत के बाद मैं बनारस घराने से जुड़ी। वहां मैंने पंडित राजन-साजन मिश्रा जी से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली। यह तालीम 3 से 4 साल तक ली थी। हम जो मंच पर प्रस्तुत करते हैं यह शास्त्रीय मिश्रित गायकी है। शास्त्रीय संगीत की तालीम होना बहुत जरूरी है, इसके बिना शुद्ध गायन की परिकल्पना नहीं कर सकते।


संगीत में घराना कितना महत्वपूर्ण है?

– बहुत महत्वपूर्ण है। यदि आप किसी घराने से नहीं हैं, तो भी घराने वाले आपको स्वीकार करेंगे। घराना सीखने वाले को स्वीकार करना चाहिए। सबसे बड़ी बात है कि आपमें सीखने की चाहत होनी चाहिए। यदि आपकी आवाज में सुर नहीं हैै। आपको सा लगाना भी नहीं आता, तो भी घराना आपको स्वीकार करेगा। बस, आपमें सीखने की ललक होनी चाहिए। (डाॅ जागृति लूथरा ) मैंने बाहरवीं के बाद संगीत सीखा है। मैं गायकी बचपन में बहुत सीखी थी। शौकिया भजन गाए, लेकिन विधिवत सीखा मैैंने 17 साल की उम्र में आरंभ किया। इस उम्र में घराने के बच्चे परिपक्व हो चुके होते हैं।


आप दोनों अपनी सूफी गायकी के बारे में बताएं?

– शास्त्रीय संगीत की तालीम होना बहुत जरूरी है, लेकिन सूफी गायन में उर्दू, पर्शियन, पंजाबी, हिंदी, बृज भाषा का ज्ञान होना चाहिए। यदि आपको भाषा बोलनी नहीं आएगी और शब्दों का तल्लफुज एकदम सटीक नहीं होगा। ऐसे में मंच पर कोई भी कमियां निकाल सकता है। (डाॅ जागृति लूथरा ) इस चीज को दिमाग में रखते हुए रामपुर सहवान घराने से मेरे गुरु उस्ताद सखावत हुसैन से गजल गायकी की तालीम ली। गुरुओं का साया होना बहुत जरूरी है। जिस प्रकार कुम्हार कच्चे घड़े को आकार देता है, उसी तरह गुरु भी शिष्य को परिपक्व बनाता है। हमारी गायकी में उस्ताद नुसरत फतेह खान साहब की गायकी काफी प्रभावित करती है।
सवाल – आपका पहला मंच पर गायन कब हुआ?जवाब – साल 2010 में दिल्ली इंटरनैशनल आर्ट फेस्टिवल में हमने पहली जुगलबंदी की प्रस्तुति दी थी। साल 2009 में हमें आईसीसीआर से इनप्लानमेंट मिला था।  हमारी कोशिश होती है कि वहीं गाएं जहां श्रताओं को सूफी संगीत समझ आए।


अब तक आप सूफी गायकी की कई मंचन कर चुके हैं। श्रोताओं की नब्ज कैसे पकड़े रखते हैं?

– (डाॅ नीता पांडे नेगी) हम एंटरटेनर्स हैं। हमें श्रोताओं को नियंत्रित करना और उन्हें बांधे रखना आना चाहिए। यदि मंच के सामने नृत्य हो रहा है। लोग अपनी मस्ती में झूम रहे हैं। और कोई सुनना नहीं चाहता, ऐसे माहौल में हम नहीं गाते। (डाॅ जागृति लूथरा ) मैं हम श्रोताओं को आंकलन कर लेते हैं कि उन्हें शुद्ध क्लासिकल सुनना है या लाइट।


आप श्रोताओं का मिजाज कैसे भांपते हैं?

– तालियों की गड़गड़ाहट, श्रोताओं की हंसी और उनका शोर काफी है उनका मिजाज भांपने के लिए। मंच पर होने पर श्रोताओं की तवज्जो हम पर होती है। उनसे बात करके उनका मूड पकड़ लेते हैं।
आपकी गायकी की यूएसपी क्या है?

– सूफी गायन काफी मुश्किल है। उसे समझना उतना ही कठिन। हमारी पीएचडी का यह फायदा हुआ है कि हम गीत की संरचना को समझ लेते है और समझा भी देते हैं।  हम गायकी के साथ-साथ संरचना को समझाते भी रहते हैं।

आप गीतों का चयन कैसे करते हैं?

– जगह के हिसाब से होता है चयन। मसलन गुजरात या पुणे में गाना है तो वही गीत गाएंगे जो उन्हे समझ में आएं। जैसे- मौला मेरे, ख्वाजा। बनारस में गाएंगे शुद्ध क्लासिकल। यह श्रोताओं पर भी निर्भर करता है।

क्या आपको लगता है कि युवा पीढ़ी शास्त्रीय संगीत और सूफी गायन को गंभीरता से लेती है?

– हम स्कूल व काॅलेज में जजमेंट देने या गायन के लिए जाते हैं। वहां युवा पीढ़ी है। आप जब उन्हें समझाएंगे कि रचना का मतलब क्या है, तो उनमें सुनने की ललक बढ़ेगी।

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