मोदी पर फ़िदा इमरान … आखिर मामला क्या है !

  • परशुराम शर्मा

क्या भाजपा से विदक रहे अल्पसंख्यक वोटों को संभालने के लिए अब पाकिस्तान सामने आया है? पाक प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान से यह सवाल यहां खड़ा हो रहा है। इमरान खान ने विदेशी पत्रकारों से बातचीत में दोबारा नरेंद्र मोदी को सत्ता में लौटने की इच्छा जतायी है।

इमरान खान ने कहा है कि कांग्रेस के सत्ता में आने से भारत-पाक समस्या के हल में देरी हो सकती है। जबकि भारत में नरेंद्र मोदी के पुन: सत्ता में आने से शांति वार्ता आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ेगी। इससे दोनों देशों के बीच उत्पन्न आपसी समस्याओं के शीघ्र सुलझने की उम्मीद की जा सकती है।

जम्मू-कश्मीर में हो रहे आतंकवादियों के हमले और भारत के एयर स्ट्राइक जैसी जवाबी कार्रवाई को लेकर उत्पन्न तनावपूर्ण स्थिति के बावजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की ओर से मोदी के पक्ष में दिये गये इस बयान को लोग अप्रत्याशित मान रहे हैं। इमरान खान के ऐसे रुख ने यहां अल्पसंख्यक समुदाय को चौंकाया है, जो उहापोह में है। इधर, प्रधानमंत्री मोदी तो चुनावी रैलियों में पाक परस्त रवैया अपनाने के लिए लगातार कांग्रेस को कोसते रहे हैं।

दरअसल, पिछले दिन मायावती ने  सहारनपुर की बसपा-सपा-रालोद की चुनावी रैली में मुसलमानों से इधर-उधर दूसरी जगह वोट न बंटने देकर एकमुश्त अपना वोट गठबंधन को देने की अपील की। मायावती की इस खुली अपील ने भाजपा के कान खड़े कर दिये। लोक सभा की अस्सी सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अल्प संख्यकों का वोट दलों के जीत-हार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में अल्पसंख्यक वोटों के किसी धुर्वीकरण से भाजपा की परेशानी समझ में आ सकती है। यह एक बड़ा खतरा हो सकता है। पिछले चुनाव में भाजपा को यहां बड़ी जीत हासिल हुई थी। इस बार भी मोदी की लहर कायम है। उसे भाजपा बनाये रखना चाहती है।

सबको पता है कि शुरुआती दिनों में कांग्रेस और बाद में समाजवादी पार्टी को इस वोट बैंक का फायदा मिलता रहा है। इसी के बदौलत समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने वर्षों तक दिल्ली में अपनी राजनीति चमकायी। प्रधानमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार बने। इसके पूर्व कांग्रेस के लगभग सारे प्रधान मंत्री उत्तर प्रदेश से चुन कर जाते रहे। खुद भाजपा के नरेन्द्र मोदी भी उत्तर प्रदेश के वाराणसी से ही सांसद हैं। मतलब जो पार्टी यहां से ज्यादा सीट जीत कर ले जाती रही, उसी का दिल्ली की सत्ता पर कब्जा रहता आया है। पूरे देश का नब्ज भी यहां से पढ़ा जाता रहा है।

उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी खतरे को भांपते हुए तुरंत कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद पर निशाना साधा। मायावती के बयान के दूसरे ही दिन उन्होंने मेरठ की एक चुनावी सभा में कहा कि अगर उन्हें अली पर विश्वास है, तो हमें बजरंगबली पर विश्वास है। मतलब हिन्दू -मुसलमानों के वोट बैंक पर उत्पन्न हुई चिन्ता की बात ही सारे नेता कर रहे हैं। स्वभावतः यहां भाजपा को भी मुसलमानों के वोट बैंक की चिंता है।

अभी हाल ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दक्षिण भारत के अल्पसंख्यक बहुल केरल के बायनाड लोकसभा सीट से  पर्चा भरने पर भाजपा ने जो हंगामा मचाया, इसका मुख्य कारण भी इसी चिंता की प्रतिक्रिया बतायी गयी। इसका देशव्यापी असर हुआ। भले वहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी से अलग पर्चा दाखिल करने के कई दूसरे कारण भी गिनाये। नामांकन के पूर्व प्रियंका गांधी के साथ उनके भीड़ भरे रोड शो में वहां फहराये जाने वाले मुस्लिम लीग के हरे झंडे पर भाजपा ने उनके देशभक्ति पर सवाल खड़े किये।

इधर, दिल्ली जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी के बयान से भी देश के अल्पसंख्यक समुदाय को चिंता हुई। कई अन्य धर्म गुरू भी पक्ष-विपक्ष में फतवा देने में लगे हैं। पर, हर बार ऐसे मौके पर अपना फतवा जारी करने वाले मौलाना इमाम बुखारी के जारी बयान से लोगों में उहापोह की स्थिति उत्पन्न हुई।

बिहार में मुस्लिम-यादव यानी ‘माई’ के वोटों पर राजनीति करने वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन के सबसे बड़े नेता व राजद सुप्रीमो लालू के साथ कांग्रेस के शामिल रहने का एक कारण यही माना जा रहा है। पहले इसका फायदा नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद के साथ मिलकर उठाया। वहां अल्पसंख्यक समुदाय का वोट बैंक एनडीए से छिटका बताया जा रहा है। हालांकि इस बार वहां जद(यू) नेता व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चल रही है। लोकसभा चुनाव पर इसका असर पड़ने का खतरा बना हुआ है।

कुल मिलाकर देखा जाये तो यह भी स्पष्ट होता है कि भाजपा ने भी तीन तलाक को खत्म करने जैसे जो कदम उठाया, वह मुस्लिमों की आधी आबादी को साधने की कोशिश का ही नतीजा माना जाता है। फिर भी भाजपा इस लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव को वह हल्के मूड में नहीं लेना चाहती। इसके लिए उसका नया से नया प्रयोग चालू है। भले इसके लिए कोई लक्ष्मण रेखा ही क्यों ना पार करना पड़े। ऐसे में प्रथम चरण के मतदान के ठीक पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान से विपक्षी दलों में उबाल आना स्वभाविक कहा जा सकता है।

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