बॉलीवुड के पहले सुपर स्‍टार कुंदन लाल सहगल

अपने भावप्रवण अभिनय और  गायन से 1930 और 40 के दशक में जनसाधारण को संगीतमय फिल्मों की ओर खींचने वाले अद्भुत कलाकार कुंदनलाल सहगल जी की 115वी जयंती पर सादर अभिवादन।
-पी के तिवारी

 जब दिल ही टूट गया सांग कभी ना कभी हर बॉलीवुड फैन ने सुना पसंद किया है और युवा फैन्‍स भी इस सांग को गाने वाले लीजेंडरी सिंगर के एल सहगल यानि कुंदन लाल सहगल को जानते हैं। बॉलीवुड के पहले सुपर स्‍टार कहे जाने वाले इन्‍हीं एक्‍टर और सिंगर सहगल की आज बिर्थ एनिवर्सरी है। आइये जाने उनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।
कुंदन लाल सहगल का जन्‍म जम्‍मू में हुआ। उनके पिता अमरचंद जम्‍मू कश्‍मीर के राजा के तहसीलदार थे। संगीत की ओ सहगल का झुकाव अपनी मां केसर बाई की वजह से हुआ जो बेहद धार्मिक और संगीत प्रेमी महिला थीं। मां ही सहगल को ऐसी गैदरिंग में लेकर जाती थीं जहां शास्‍त्रीय संगीत पर आधारित भजन कीर्तनों का आयोजन होता था। यहीं से केएल की संगीत की प्राथमिक शिक्षा हुई, पर उन्‍होंने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा कभी प्राप्‍त नहीं की। केवल  प्रारंभिक शिक्षा के बाद सहगल ने स्‍कूल छोड़ दिया और मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर टाइमकीपर की नौकरी कर ली। उसके बाद वे कानपुर आये और यहां चमड़े के कारोबारियों के यहां नौकरी की, यहां गजल की महफिलें लगाने वाले सहगल ‘चमड़ा बाबू’ के नाम से फेमस हो गए। यहीं एक नामी तवायफ के यहां उन्‍होंने संगीत सीखा। इसके बाद उन्होंने गाजियाबाद में रैमग्टन कंपनी में सेल्समैन का काम किया। तब उन्हें बीस रुपये मासिक वेतन मिलता था।इसके बाद 1940 में वे मुंबई गए और अपने बॉलीवुड करियर की शुरूआत की। यहां उन्‍हें कई बार रिजेक्‍शन का भी सामना करना पड़ा। पर बाद में लोग उन्‍हें संगीत का बादशाह मानने लगे और वो अपने फन के दम पर बॉलीवुड के पहले सुपरस्‍टार बने। 


भारतीय सिनेमा जगत के पहले महानायक का दर्जा प्राप्त करने वाले के.एल.सहगल ने अपने दो दशक के लंबे सिने कैरियर में महज 185 गीत ही गाये इनमें 142 फिल्मी और 43 गैर फिल्मी गीत शामिल है, लेकिन उन्हें जितनी ख्याति प्राप्त हुयी उतनी हजारो की संख्या में गीत गाने वाले गायको को नसीब नही हुयी । वर्ष 1904 को जम्मू के नवाशहर में रियासत के तहसीलदार अमर चंद सहगल के घर जब कुंदन का जन्म हुआ तो पिता ने यह कभी नही सोचा होगा कि उनका पुत्र अपने नाम को सार्थक करते हुए वाकई एक दिन .कुंदन. की तरह ही चमकेगा। कुंदन दरअसल स्वर्ण का शुद्धतम रूप होता है । सामान्य तौर पर स्वर्ण को कई बार गलाने-तपाने पर जो धातु बनता है उसे कुंदन कहा जाता है जिसकी आभा कभी कम नही होती । यही बात कुंदन लाल सहगल पर चरितार्थ होती है । 
बचपन से ही सहगल का रूझान गीत-संगीत की ओर था। उनकी मां केसरीबाई कौर धार्मिक कार्यकलापों के साथ साथ संगीत मे भी काफी रूचि रखती थी । सहगल अक्सर मां के साथ भजन-कीर्तन जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाया करते थे और अपने शहर मे हो रही रामलीला के कार्यक्रमों मे भी हिस्सा लिया करते थे। सहगल ने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन सबसे पहले उन्होंने संगीत के गुर एक सूफी संत सलमान यूसुफ से सीखे थे । बचपन से ही सहगल में उन्हे गहरी समझ थी और एक बार सुने हुये गानों के लय को वह बारीकी से पकड़ लेते थे । सहगल की प्रारंभिक शिक्षा बहुत ही साधारण तरीके से हुयी थी। उन्हें अपनी पढा़ई बीच मे ही छोड़ देनी पड़ी और जीवन यापन के लिये उन्होंने रेलवे मे टाईमकीपर की मामूली नौकरी भी की थी । बाद में उन्होंने रेमिंगटन नामक टाइपराइंटिग मशीन की कंपनी में सेल्समैन की नौकरी भी की । वर्ष 1930 मे कोलकाता के न्यू थियेटर के बी.एन.सरकार ने सहगल को 200 रूपये मासिक पर अपने यहां काम करने का मौका दिया। वहां उनकी मुलकात संगीतकार आर.सी.बोराल से हुयी जो सहगल की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये । धीरे धीरे सहगल न्यू थियेटर मे अपनी पहचान बनाते चले गये । 
शुरूआती दौर में बतौर अभिनेता सहगल को वर्ष 1932 में प्रदर्शित एक उर्दू फिल्म ..मोहब्बत के आंसू ..में काम करने का मौका मिला । वर्ष 1932 में ही बतौर कलाकार उनकी दो और फिल्में ..सुबह का सितारा.. और .. जिंदा लाश.. भी प्रदर्शित हुयी लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास पहचान नहीं मिली । वर्ष 1933 मे प्रदर्शित फिल्म ..पुराण भगत .. की कामयाबी के बाद बतौर गायक सहगल कुछ हद तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। इस फिल्म में उनके गाये चार भजन देश भर में काफी लोकप्रिय हुये । इसके बाद यहूदी की लड़की.चंडीदास और रूपलेखा जैसी फिल्मों की कामयाबी से सहगल ने दर्शको का ध्यान अपनी गायकी और अदाकारी की ओर आकर्षित किया । शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित पी.सी.बरूआ निर्देशित फिल्म ..देवदास .. की कामयाबी के बाद सहगल बतौर गायक .अभिनेता शोहरत की बुंलदियो पर जा पहुंचे । इस फिल्म मे उनके गाये गीत काफी लोकप्रिय हुये । इस बीच सहगल ने न्यू थियेटर निर्मित कई बंगला फिल्मों में भी काम किया । 
वर्ष 1937 में प्रदर्शित बंग्ला फिल्म ..दीदी.. की अपार सफलता के बाद सहगल बंगाली परिवार में हृदय सम्राट बन गये । उनका गायन सुनकर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था ..सुंदर गला तोमार आगे जानले कतो ना आंनद पैताम .. अर्थात आपका सुर कितना सुंदर है पहले पता चलता तो और भी आनंद होता। .. वर्ष 1946 मे सहगल ने संगीत सम्राट .नौशाद. के संगीत निर्देशन में फिल्म ..शाहजहां..में गम दिये मुस्तकिल और जब दिल ही टूट गया जैसे गीत गाकर अपना अलग समां बांधा । अपने दो दशक के सिने कैरियर में सहगल ने 36 फिल्मों में अभिनय भी किया । हिन्दी फिल्मों के अलावा सहगल ने उर्दू .बंगला.तमिल. फिल्म में भी अभिनय किया। अपनी जादुई आवाज और अभिनय से सिने प्रेमियों के दिल पर राज करने वाले के.एल.सहगल 18 जनवरी 1947 को महज 43 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गये। सहगल की मौत के बाद बी.एन.सरकार ने उन्हें श्रंद्धाजली देते हुये उनके जीवन पर एक वृत्त चित्र ..अमर सहगल ..का निर्माण किया। इस फिल्म में सहगल के गाये गीतों मे से 19 गीत को शामिल किया गया । 
सहगल के दिलदार नेचर और मस्‍तमौला मिजाज के कई किस्‍से फेमस हैं। कहते हैं कि केएल सहगल ने एक बड़े संगीत आयोजन में इसलिए गाने से मना कर दिया था क्योंकि उस दिन उन्हें अपने ड्राइवर की बेटी की शादी में गाने के लिए जाना था। एक बार किसी की मदद के लिए उन्होंने बाजार में घूम-घूमकर गाना गाया और चंदा इकट्ठा किया था। सहगल का एक ही सपना था कि वे एक बहुत बड़े संगीत सम्मेलन में गायें और लोग वाह-वाह करें और सामने उनकी मां बैठी हो और तब वे कहें कि मेरे सम्मान की असली हक़दार मेरी मां हैं। उनका यह सपना साकार भी हुआ। सहगल को जो शोहरत मिली वो कम ही लोगों को हासिल होती है। उनकी लोकप्रियता का आलम ये रहा है कि अपने दौर के सबसे मशहूर रेडियो चैनल रेडियो सीलोन ने करीब 48 साल तक हर सुबह अपना एक कार्यक्रम सहगल के गानों पर ही आणारित रखा था। 


सहगल ने 36 फिल्मों में अभिनय किया और 200 से ज्यादा गाने गाए। महज 43 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन इस छोटे से दौर में उन्होंने शोहरत की बुलंदियां हासिल कर ली थीं। अत्याधिक शराब पीने के कारण 1946 में वह बेहद बीमार हो गए और अपने प्रशंसकों से सेहतमंद होकर लौटने का वादा कर के अपने प्रिय नगर जालंधर चले आए। जहां 18 जनवरी 1947 को लीवर की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। शराब की लत उनको इस हद तक थी कि सहगल ने अपने लगभग सभी गाने शराब के नशे में गाए, केवल एक ही गाना ‘जब दिल ही टूट गया उन्होंने बिना शराब पिए गाया था। कहा तो ये भी जाता है कि इसी गाने को सुनते हुए उनके प्राण निकले थे।  सहगल और हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से जुड़ा एक मजेदार किस्‍सा बड़ा मशहूर हुआ है। एक बार फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर मुंबई में हो रहे एक मैच में सहगल को ले आए। इस मैच में हॉफ टाइम तक जब कोई गोल नहीं हुआ तो सहगल ने पृथ्‍वीराज से कहा कि उन्होंने ध्‍यानचंद और रूप सिंह का बहुत नाम सुना है उन्‍हें ताज्जुब है कि कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया। ये पता चलने पर रूप सिंह ने पूछा कि क्या वे दोनों जितने गोल मारेंगे उतने गाने वे सुनाएंगे? सहगल राज़ी हो गए। सेकंड हाफ में दोनों ने मिलकर 12 गोल कर दिए, पर फ़ाइनल विसिल बजने से पहले सहगल स्टेडियम छोड़ कर जा चुके थे। अगले दिन सहगल ने अपने स्टूडियो आने के लिए ध्यान चंद के पास अपनी कार भेजी, लेकिन जब वे पहुंचे तो सहगल ने कहा कि अब उनका मूड उखड़ चुका है। ध्यान चंद अपना समय ख़राब होने पर बड़ा दुख हुआ, लेकिन अगले दिन सहगल खुद अपनी कार में वहां पंहुचे जहां टीम ठहरी हुई थी और उन्होंने उनके लिए 14 गाने गाए और हर खिलाड़ी को एक एक घड़ी भी भेंट की।

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