-पी के तिवारी

एक वो दौर था जब बिना पैसे के चुनाव जीता जाता था।

मौजूदा दौर में जब चुनाव का वास्तविक ख़र्च करोड़ों में होता है, इस बात की कल्पना भी मुमकिन नहीं कि कोई निर्धन प्रत्याशी ख़ाली हाथ चुनाव के मैदान में उतरेगा और जीत जाएगा, पर 1967 में ऐसा हुआ था.
चुनाव में बढ़ते धनबल के उपयोग से चुनाव आयोग चिंतित है और इस पर अंकुश लगाने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन कराना चाहता है। हमारा चुनाव आयोग ढोंढिय़ा (पनिया) सांप की तरह है। पनिया सांप में रिस (क्रोध) तो होता है, लेकिन विष नहीं होता। मतलब वह विपरीत स्थिति के खिलाफ गुस्सा तो करता है। लेकिन दंड का अधिकार न होने के कारण उसके गुस्से को लोग सीरियसली नहीं लेते। मतलब चुनाव आयोग धनबल पर गुस्सा तो दिखाता है लेकिन दंडात्मक कार्रवाई का अधिकार उसके पास नहीं है। इसलिए वह दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकता। क्या हमारा चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के हाथ में पड़ गया एक खिलौना है।

राजनीतिक दल चुनाव आयोग के साथ खेलते हैं। यहां राजनीतिक दल चुनाव आयोग के साथ छिपा-छुपाउल खेलते हैं। हमारे राजनीतिक दल किसी संस्था को खिलौना बना देने के उस्ताद हैं। स्वायत्त संस्थाओं को किस तरह पंगु बना दिया कि जनता देखते ही रह गई- अब तो स्वायत्त संस्थाएं राज्य व केन्द्र सरकार के कंधे पकडक़र या कहें ऊंगली थामकर घसीटते हुए आगे चल पाती है। सरकारों की दया पर स्वायत्त संस्थाओं का जीना-मरना निर्भर है। चुनाव आयोग को किस तरह दंतविहीन बनाकर काम में लगा दिया जाए यह राजनीतिक दलों ने साझेदारी फर्म बनाकर तय किया और इन दलों की यह साझेदारी फल-फूल रही है।

कोई भी दल नहीं चाहता कि निष्पक्ष कुछ भी हो। ‘अपने पक्ष में होना ही उनके लिए निष्पक्षता है।’ धनबल के उपयोग के खिलाफ कानून बनाने चुनाव आयोग ने केन्द्र को चिट्ठी लिखी है। अब यह ऐसी चिट्ठी तो है नहीं ‘खून से लिख रही हूं, स्याही न समझना’ कि सरकार तत्काल बांच ले और निदान निकाल ले। योजना आयोग करे भी क्या। कर यह सकता है कि सरकार को सुधार के सुझाव दे कि क्या-क्या सुधार किए जाएं और चुनाव आयोग को और क्या अधिकार दिए जाएं। क्या सरकार उसके सुझाव को मान लेगा? यह यक्ष प्रश्न है। अपने पैर में ही कुल्हाड़ी नहीं मारती सरकारें… बड़ा मायाजाल रचती हैं। और उनके मायाजाल को वे ही समझती हैं। इस रहस्य को वे ही जानती हैं। चुनाव आयोग को कितना अधिकार दिया जाना चाहिए- राजनीतिक दलों का अहित न कर सके बस उसी के अंदर अधिकार देना चाहिए- इसमें सारे दल एक मत हैं। यह किया धरा राजनीतिक दलों का है। सरकार ने आयोग को कुछ हथियार दे रखे हैं- ये हथियार सरकारी हैं। बूथ कैप्चरिंग के खिलाफ और बाहुबल के उपयोग के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है- चुनाव रद्द कर सकता है आयोग।

लेकिन धनबल के खिलाफ क्या करे। धनबल या कहें वोट के लिए रिश्वत का मामला तो सीधे उम्मीदवार के अस्तित्व से जुड़ा है। यहां बड़ा पेंच है इसलिए आयोग अपनी तरफ से कुछ न कर सके वह राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति से चुनाव रद्द कराने अथवा स्थगित करने की सिफारिश कर सकता है। हमारे यहां चुनाव की डगर बहुत ही कांटों भरी है। साधारण जन तो उस राह पर चलने की सोच भी नहीं सकते। इसीलिए आमजन केवल वोटर हैं और चुनाव के राह पर चलने वाले विशिष्ट हैं। इस लोकतंत्र में दो वर्ग बन गए- एक ‘सत्ता’ और दूसरा है ‘वोटर’। सत्ता ही पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर अपनी मर्जी के नियम बनाती है, जो उसे माफिक लगें। हमने बुर्जुआ लोकतंत्र को स्वीकार किया है तो उसके अनुसार ही तंत्र चलेगा। उसके चरित्र के विपरीत आचरण की उम्मीद तो की ही नहीं जानी चाहिए-‘पेड़ लगाए बबूल का, आम कहां से होय…।’ इस बबूल के पेड़ के कांटे देखो। बहरहाल इस लोकतंत्र में बाहुबल और धनबल का प्रयोग लगातार बढऩे लगा। पहले आम चुनाव में और उसके बाद एक-दो और आम चुनावों में साड़ी-कम्बल, धोती, रुपया, दारू बांटने का रिवाज शुरु हुआ और यह धीरे-धीरे बढऩे लगा। बाहुबल पर 19वीं सदी के अंत तक जमकर चर्चा होती रही। खासकर कुछ राज्यों में बाहुबल के प्रयोग की खबरें आती रहीं।

बूथ कैप्चरिंग आम बात होने लगी थी और मतपत्र पर ठप्पा लगाने का काम थोक में होने लगा था- बाहुबलियों के दम पर चुनाव जीते जाने लगे थे। सब देख-सुन रही थी जनता। समझ रही थी जनता। लेकिन सत्ता व व्यवस्था के केन्द्र में बैठे लोग इस बुर्जुआ लोकतंत्र को ‘परिपक्व’ होता बताते हुए स्तुतिगान करवा रहे थे। यह माना जाने लगा और होने भी लगा कि चुनाव में जो जितना खर्च करे, सफलता उसके चरण चूमेगी। अपवाद रहे जरूर। लेकिन अपवाद तो निष्पक्षता को सिद्ध नहीं करता। देखा-समझा जाए तो यह लोकतंत्र ‘धनपतियों’ के पक्ष में होता है। यह धनपतियों का पक्षधर है। सत्ता में जो बैठते हैं वे अब कार्पोरेट के इशारों पर चलते हैं। जरा भी इधर-उधर पैर रखा कि कार्पोरेट उसके पैर ही खींच देता है- न रहे पैर न चल सको। गत चुनाव में कार्पोरेट ने कांग्रेस को किनारे करवा दिया। अब बाहुबल की जरूरत ही नहीं है। बुर्जुआ लोकतंत्र बड़ी सुविधाएं देता है और इसमें खेलने वाले समझते हैं कि कब किस हथियार का उपयोग किया जाए। बाहुबल को ज्यादा आजमाना खिलाडिय़ों को हितकर नहीं लगा, इसलिए धनबल का जोर बढ़ा है। पैसे की ताकत को तो सब जानते हैं। पूरा तंत्र ही भ्रष्ट बना दिया जा रहा है। जनता को पंगु बनाकर राज करने का उपक्रम जोरों पर है। चुनाव में कितना पैसा बहाया जाता है, यह सबके सामने है। मजेदार बात यह कि चुनाव आयोग खर्च की सीमा बांधता है। है न हंसी की बात। वोटर को पैसे देना-यह भी चर्चा में रहता है। जनता को ही भ्रष्ट करने का महान काम इस लोकतंत्र में शुरु हो गया है।

कुछ जनप्रतिनिधि इसीलिए काम नहीं करते कि चुनाव में वे वोटर को सेट कर लेते हैं। बड़ा ही गोरख धंधा है। राज्यसभा के लिए चुनाव में राजनीतिक दल का कोई उम्मीदवार हार जाता है और कोई ‘धनपति’ निर्दलीय होकर भी चुनाव जीत लेता है- प्राय: सभी दल के सदस्य उसके पक्ष में वोट करते हैं। राजनीतिक दलों को पता होता है कि क्या हो रहा है, क्या हुआ। लेकिन ‘धनबल’ के सामने वे भी मौन साधे रहते हैं- सुचिता-सुचिता कहने वाले को राजनीति का बनवास दे दिया जाता है। धनबल के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक होता है। हमारे देश में बुर्जुआ राजनीतिक दल ही इस स्थिति के लिए दोषी है। इन्हीं का करा-धरा है सब और ‘करे कोई, भरे कोई’ की तर्ज पर इनका किया जनता भोग रही। लोकतंत्र को धनतंत्र बना दिया। कानून बना देने से चुनाव में धनबल नहीं रुक सकता। यह तो इस लोकतंत्र के गर्भ से पैदा होता है- कानून तो इस लोकतंत्र का खिलौना है- जैसा चाहे वैसा खेले और फिर न्यायपालिका के प्रति भी तो अब इनका आक्रोश फूटने लगा है। इन्हें जरा भी अवरोध पसंद नहीं। बहरहाल चुनाव सुधार में एक बड़ा काम यह किया जाए कि बड़े-बड़े चुनाव क्षेत्र छोटे किए जाएं। सवा अरब की आबादी में मात्र 543 सांसद- क्या मजाक है। लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाई जाए- सवा अरब का फैसला साढ़े पांच सैकड़ा से भी कम लोग करें, यह न हो। सदस्यों की संख्या काफी हो और उनके वेतन आदि को इस तरह निर्धारित किया जाए कि बोझ भी न पड़े। यह व्यवस्था धनबल को समाप्त करने में एकदम अक्षम है- इसमें धनबल का प्रभाव और बढ़ेगा

राजनीति यानी राज की नीति। जनता की भलाई के लिए सत्ता द्वारा बनाई जाने वाली नीति। आधुनिक लोकतंत्र में इन नीतियों के बनाने वाले होते हैं हमारे राजनेता। जनता द्वारा चयन किए जाने के बाद ये लोग सत्ता में पहुंचते हैं। फिर ये राजनीति यानी जन कल्याणकारी नीतियां बनाकर और जनता के हितों की रक्षा कर राजनेता बनते हैं। शुरुआती दौर में समाज सेवा रही राजनीति कालांतर में एक पेशे का रूप अख्तियार करती जा रही है। राजनीति निहित तमाम स्वार्थो के चलते लोग साम-दाम-दंड भेद के बूते राजनीति में आना चाहते हैं। जन सेवा की भावना अब गौण हो चली है। सियासत में बढ़ती तिजारत की प्रवृत्ति से यहां ‘पैसे का खेल’ एक लाइलाज बीमारी बनता जा रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि राजनीति में धनबल को रोकने में हम फिसड्डी साबित हुए हैं। इसका ताजा उदाहरण 5 राज्यो के विधानसभा  चुनाव है। यहां चुनाव के दौरान खुलेआम धनबल का इस्तेमाल देखा गया। चुनाव आयोग ने सख्त कदम उठाते हुए भले ही राज्यसभा चुनाव पर रोक लगा दी हो और हाई कोर्ट ने सीबीआइ जांच का आदेश दे दिया हो, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि धन के बगैर इस राजनीति में सफलता अपवाद ही है। राजनीति में बढ़ते धनबल की प्रवृत्ति आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।


हालिया झारखंड राज्यसभा चुनाव मतदान के कुछ घंटे पहले रांची शहर के बाहरी इलाके में एक कार में 2.15 करोड़ रुपये का मिलना एक बार फिर हमारे लोकतंत्र की राजनीतिक कार्यप्रणाली में पैसे के खेल की भूमिका को बताता है। इस ताजातरीन घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए झारखंड हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को विस्तृत जांच करने के आदेश दिए हैं। यद्यपि इससे पहले ही चुनाव आयोग ने उस चुनाव को रद कर दिया।


अब यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली में धनबल की बड़ी भूमिका है लेकिन पिछले कुछ वर्षो में यह खुलकर सामने आ गया है। सुप्रीम कोर्ट में झारखंड मुक्ति मोर्चा केस, संसद में प्रश्न पूछने के बदले धन का मुद्दा और लोकसभा में रुपये की गड्डियां लहराने जैसी घटनाएं राष्ट्रीय शर्म का विषय बनी हैं। हालिया वर्षो में राजनेताओं ने भी इसको स्वीकारना शुरू कर दिया है और यहां तक कि तर्कसंगत बनाने का प्रयास भी किया है।
इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज तथ्य लोकसभा चुनाव 2009 में 6,753 प्रत्याशियों के हलफनामों की पड़ताल से उजागर हुए हैं, जिनका विश्लेषण एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉ‌र्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच ने किया है। इतने सारे प्रत्याशियों में से केवल चार ने यह घोषणा करते हुए बताया कि उन्होंने निर्धारित तय सीमा से ज्यादा खर्च किया। केवल 30 लोगों ने यह घोषित किया कि उन्होंने तय सीमा का करीब 90-95 प्रतिशत खर्च किया। जबकि कुल 6,753 में से 6,719 यानी 99.5 प्रतिशत ने घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने केवल तय सीमा का 40-45 प्रतिशत खर्च किया है। 2009 में खर्च की तय सीमा 16 लाख थी। जबकि चुनाव से पहले और बाद में तय सीमा को कम मानते हुए लगभग एक सुर में जोर-शोर से यह मांग की जा रही थी कि इस सीमा को बढ़ा दिया जाना चाहिए।


चुनाव में खर्चे की तय सीमा को बढ़ाए जाने की इस मांग के बीच 99.5 प्रतिशत प्रत्याशियों ने घोषणा करते हुए कहा कि वह तय सीमा का आधा ही खर्च कर सके। इस आश्चर्यजनक तथ्य से ही सहज ही विरोधाभास का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब चुनावी खर्चे की वह तय सीमा बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गई है। इसके बावजूद अधिकांश राजनीतिक दलों के नेता टीवी बहसों में कहते दिखते हैं कि यह सीमा भी कम है और इसको और अधिक बढ़ाए जाने की जरूरत है। चुनावी खर्चे के मामले में निर्वाचन आयोग एक सलाहकारी निकाय है। इस संबंध में निर्णय अंतिम तौर पर सरकार ही लेती है। ऐसे में प्रत्याशियों के हलफनामे को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि चुनावी खर्चे की तय सीमा को बढ़ाने की बजाए घटा दिया जाना चाहिए।


राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का यह एक पहलू है। एक बार जब एक प्रत्याशी बड़ी मात्रा में अघोषित पैसा चुनाव में लगाता है तो वह जीतने के लिए इसको ‘निवेश’ की तरह इस्तेमाल करता है। इसी का नतीजा होता है कि चुनाव जीतने के बाद सार्वजनिक धन का बड़े पैमाने पर गबन किया जाता है। ऐसे मामले कभी-कभी कुछ महीनों में सामने आते हैं तो कुछ वर्षो बाद उजागर होते हैं।
दरअसल यह प्रक्रिया चुनाव शुरू होने से पहले ही शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों द्वारा ‘टिकटों के बंटवारे’ की प्रक्रिया से ही यह शुरू होती है। हर राजनीतिक दल द्वारा टिकटों का बंटवारा एक केंद्रीकृत बॉडी द्वारा किया जाता है जिसको ‘हाई कमान’ कहा जाता है। यह बॉडी पार्टी के सदस्यों से लेकर निर्वाचकतक किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। भारतीय राजनीति की यह सबसे बुनियादी समस्या है।


यह एक विचित्र स्थिति है कि हम लोग अपने को लोकतांत्रिक देश कहते हैं जोकि ऐसे राजनीतिक दलों द्वारा चलाया जा रहा है जिनकी आंतरिक कार्यप्रणाली आनुवांशिक और पूर्ण रूप से अलोकतांत्रिक ढंग से काम कर रही है। राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में लोकतंत्र में कमी और एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के कारण ही राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
राजनीतिक दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली में लोकतंत्र और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए। वित्तीय मामलों की अनिवार्य रूप से ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [कैग] द्वारा की जानी चाहिए। यही एकमात्र रास्ता है जिससे देश की राजनीतिक प्रणाली में धनबल के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाया जा सकेगा।


ज्यादा धन, चुनाव जीतने की अधिक संभावना
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जिस उम्मीदवार के पास ज्यादा संपत्ति होती है उसके चुनाव जीतने की अधिक संभावना होती है। पांच करोड़ या उससे अधिक की संपत्ति घोषित करने वाले एक तिहाई उम्मीदवारों को विजय मिली है। दूसरी तरफ 10 लाख से कम संपत्ति घोषित करने वालों में से एक फीसदी से भी कम उम्मीदवारों को ही सफलता मिली है। इस तरह ऐसा लगता है कि धनबल चुनावी नतीजों को अत्यधिक प्रभावित करता है।


आज के हालात में तो खैर, जब लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा सत्तर लाख रुपयों तक जा पहुंची है, वह भी सिर्फ कागजों में होती है और चुनाव का वास्तविक खर्च लाखों नहीं, करोड़ों में होता है, इसकी कल्पना भी मुमकिन नहीं कि कोई निर्धन प्रत्याशी खाली हाथ चुनाव मैदान में उतरेगा और जीत जाएगा.


लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब प्रत्याशी बिना कुछ भी खर्च किए और कई बार बिना वोट मांगे ही चुनाव जीत जाते थे. हां, मतदाताओं द्वारा गलत कामों की पैरवी से क्षुब्ध होते तो चुनाव का टिकट ठुकराने से भी नहीं हिचकिचाते थे.


आइये, आज आपको देश की राजनीति की कुछ ऐसी ही भुला दी गई शख्सियतों की बाबत बताते हैं-


1967 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी चिंतक डाॅ. राममनोहर लोहिया द्वारा प्रवर्तित गैरकांग्रेसवाद के दौर में उनकी जन्मस्थली को समाहित करने वाली अकबरपुर (सुरक्षित) सीट पर कांग्रेस नेता पन्नालाल का कब्जा था.


गैरकांग्रेसवादी शक्तियों ने उन्हें चुनौती देने के लिए सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार की तलाश शुरू की तो वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टांडा निवासी बीए तक पढ़े दलित कार्यकर्ता रामजीराम पर खत्म हुई.


लेकिन उनकी उम्मीदवारी में दो बड़ी दिक्कतें थीं. पहली यह कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हो रहे थे और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में भाकपा प्रत्याशियों से प्रतिद्वंद्विता कर रहे अन्य गैरकांग्रेसी दल लोकसभा के लिए उसी के प्रत्याशी का समर्थन या प्रचार करने को तैयार नहीं थे.


दूसरी यह कि रामजीराम के हाथ एकदम खाली थे. पहली समस्या का तोड़ तो रामजीराम को रिपब्लिकन पार्टी का प्रत्याशी बनवाकर निकाल लिया गया, जिस पर किसी को ऐतराज नहीं था.
लेकिन दूसरी समस्या ज्यादा विकट थी. जैसे-तैसे चंदा करके उनके लिए नामांकन पत्र खरीदा गया. मित्रों व शुभचिंतकों से उन्हें कचहरी तक पहुंचने का किराया भी मिल गया.


लेकिन ‘पापी पेट’ को भी इसी समय आड़े आना था. कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद कहा गया कि पर्चा भरने चलें तो वे बोले, ‘भूख के मारे मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा. क्या करूं, घर में खाने को कुछ था ही नहीं, सो बिना खाए ही निकल पड़ा.


इस पर वहां उपस्थित कुछ वकीलों ने उन्हें चाय-नाश्ता करवाकर खड़े होने लायक बनाया. बाद में उनके समर्थन में थोड़े बहुत पर्चे व पैम्फलेट वगैरह भी छपे, लेकिन जिसे चुनाव प्रचार कहते हैं, वह लगभग न के बराबर हुआ.


विधानसभा चुनाव के गैरकांग्रेसी प्रत्याशियों ने मतदाताओं को अपने साथ उनका चुनावचिह्न भी बता दिया और इसी को बहुत मान लिया गया.मतदान के बाद, और तो और, खुद रामजीराम को भी उम्मीद नहीं थी कि वे जीतेंगे. लेकिन मतगणना में उन्होंने कांग्रेस के पन्नालाल को 3426 वोटों से हरा दिया. उन्हें 99198 वोट मिले और पन्नालाल को 95672.


अर्थाभाव के चलते जीतने के बाद सांसद के तौर पर उनका दिल्ली जाना भी मुश्किल था. न बदन पर ढंग के कपड़े थे और न जेब में किराया.


एक कम्युनिस्ट साथी के अनुग्रह से इस सबका इंतजाम हुआ तो साधारण कद-काठी और वेशभूषा के चलते सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें अवांछित समझकर लोकसभा में घुसने से ही रोक दिया!


तब उन्हें अपनी जीत का प्रमाणपत्र दिखाना और बताना पड़ा कि वे भी सांसद हैं! इम्पीरियल होटल में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई तो उन्होंने कहा कि यहां तो वे अपने खर्चे पर चाय तक नहीं पी सकते!


बाद में रिपब्लिकन पार्टी के एक अन्य सांसद जो 15, जनपथ में रहते थे, उन्हें इस शर्त पर अपने साथ ले गए कि जब वेतन मिलेगा तो वे भी खर्चे में हिस्सा दे देंगे!


चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए न जाने के बावजूद जीतेपर्चा भरने के बाद अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए न जाने के बावजूद जीतने वाले नेताओं में एक नाम स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद का भी है, जो बाद में देश के पहले शि़क्षामंत्री बनाए गए.


1952 के लोकसभा आमचुनाव में मौलाना आजाद उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से प्रत्याशी थे. उनके खिलाफ हिंदू महासभा के बिशनचंद सेठ चुनाव लड़ रहे थे.बिशनचंद का चुनाव प्रचार तो धुंआधार चल रहा था, लेकिन देश भर में कांग्रेस के प्रचार की जिम्मेदारी सिर पर होने के कारण मौलाना अपने मतदाताओं के बीच जाने का समय ही नहीं पा रहे थे.


बहुत हाथ-पांव मारने और कन्नी काटने के बाद भी वे सार्वजनिक रूप से चुनाव प्रचार का वक्त खत्म होने से पहले रामपुर नहीं जा सके. जब पहुंचे तो घर-घर जाकर प्रचार करने का समय ही बचा था. पर सीमित समय में वे इस तरह कितने घरों में जा पाते फिर भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई. मतगणना हुई तो मौलाना 59.57 प्रतिशत वोट पाकर खासी शान से जीते. उन्हें 1,08,180 वोट मिले जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी हिंदू महासभा के बिशनचंद को महज 73,427 वोट.
जीतने वाले की भी जमानत जब्त!दूसरे पहलू पर जाएं तो आज की पीढ़ी को यह भी अकल्पनीय ही लगेगा कि कोई उम्मीदवार चुनाव तो जीत जाए, लेकिन अपनी जमानत जब्त होने से न बचा पाए?


लेकिन उत्तर प्रदेश की जिस आजमगढ़ लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के निरहुआ से दो-दो हाथ करने वाले हैं, उसकी सगड़ी पूर्वी विधानसभा सीट पर 1952 में हुए पहले चुनावी मुकाबले में तेरह उम्मीदवारों के बीच मतों के व्यापक बिखराव के कारण ऐसा हो गया था.


उस चुनाव में विधानसभा क्षेत्र के कुल 83,378 मतदाताओं में से 32,378 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था और कांग्रेस के प्रत्याशी बलदेव उर्फ सत्यानंद ने 4969 मत पाकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय शम्भूनारायण को 621 मतों से हराया था.


बलदेव चुनाव तो जीत गए थे लेकिन चूंकि उन्हें कुल हुए मतदान का 15.35 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ था, इसलिए उनकी जमानत जब्त होने से नहीं बच पाई थी.


दरअसल इस चुनाव में पहली बार जनप्रतिनिधित्व कानून की सबसे बड़ी विसंगति सामने आई थी.
नियमानुसार प्रत्याशी को जमानत बचाने के लिए कुल वैध मतों का छठा भाग प्राप्त करना जरूरी है जबकि चुनाव जीतने के लिए अपने प्रतिस्पर्धियों से ज्यादा मत पाना ही पर्याप्त है.
वह छठे भाग तो क्या किसी भी भाग से कम हो सकता है. अपनी जमानत गंवा चुका व्यक्ति वास्तव में अपने चुनाव क्षेत्र के कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करता है और उसका सांसद या विधायक बने रहना कितना सम्मानजनक है, इस पर आज तक विचार नहीं किया गया.
वोटरों से खफा होकर चुनाव का टिकट ठुकराया!एक और अकल्पनीय बात करें तो आजकल नेता टिकट न मिलने पर तोड़-फोड़ पर उतर आते और अपनी दलीय निष्ठा तक बदल लेते हैं, लेकिन बिहार के समाजवादी नेता शिवशंकर यादव ने 1977 में जनता पार्टी की लहर में भी उसका टिकट लेने से इनकार कर दिया था.


इसलिए कि 1971 के लोकसभा चुनाव में खगड़िया लोकसभा सीट का सांसद बनने के बाद का उनका अनुभव कुछ ‘अच्छा’ नहीं रहा था.ज्ञातव्य है कि शिवशंकर यादव 1971 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न पर देश भर में विजयी कुल तीन प्रत्याशियों में से एक थे.
पाकिस्तान से युद्ध में मिली ऐतिहासिक विजय और बंगलादेश के अभ्युदय की लोकप्रियता के रथ पर सवार तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की आंधी ने पार्टी के बाकी सारे प्रत्याशियों की किस्मत में शिकस्त लिख डाली थी.मगर 1977 की जनता लहर में शिवशंकर यादव से खगड़िया से फिर से चुनाव लड़ने को कहा गया तो उनका उत्तर था- न मैं टिकट लूंगा और न ही चुनाव लड़ूंगा. सांसद होने का क्या मतलब, अगर मतदाता आपके पास गलत कामों की पैरवी कराने आने लगें? एक बार की सांसदी में ही मैं ऐसे कामों की पैरवी से इनकार करते-करते तंग आ चुका हूं. मेरी अंतरात्मा इस तरह आगे और तंग होते रहने की इजाजत नहीं देती.
कहते हैं कि शिवशंकर यादव का निधन हुआ तो उनके पास केवल सात रुपये थे.

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